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रविवार, 10 मार्च 2013

स्त्री 
मैने हमेशा सुना कि  स्त्री-पुरुष एक गाड़ी के दो पहिये है और इश्वर की कृपा से इतनी भाग्यशाली रही कि  हमेशा एक स्त्री के रूप में सम्मान पाया .पिता,पति,भाई ,बेटा, मित्र सबने यथोचित सम्मान दिया पर समाज में हो रहे अत्याचार,लड़किओं के प्रति दुर्व्यवहार ने दिल को दुखी किया है.कहीं एक क्रोध और आक्रोश  की भावना उस वर्ग के प्रति भर उठती है जो नारी को सम्मान नहीं देते ,उन्हे किसी योग्य नहीं मानते .क्या उन्हे किसी व्यक्तित्व के अस्तित्व को ललकारने का अधिकार है 
मैने कब तुम्हे,
अधिकार दिया,
इतना सब बतलाने का
कि मैं क्या हूँ !
अबला ,सबला 
या दुर्गा या काली 
के प्रतीकों से सजाने का .
मैने कब तुम्हे,
अधिकार दिया
कि तुम पंडित बनो और मैं अज्ञानी. 
तुम मालिक और मैं सेविका  
तुम पुन्य के भागी और मैं अपराधी 
तुम वंश के वाहक और मैं  विनाशी। 
मैने कब तुम्हे  अधिकार  दिया ,
इतने उपमानो को रचने का .
अब बंद करो ये उपालंभ. 
जीवन मुझको जीने दो  अपना 
मैं जान गयी, कि  कौन हूँ मैं 
पहचान गयी, अपना अस्तित्व 
मैने  अब अपना अधिकार लिया 
सब जान लिया सब मान लिया 
क्या सही, गलत क्या जीवन में
मुझको इसका अब भान है सब,
अब और न कोई मुझे बताये
 कब तक  मुझको जीवन जीना है
मुझको अपनी राह  में चलना  है  
जब चाहूँ  राह  बदलने  दूँ मैं 
मैने कब तुमको  अधिकार दिया 
मेरी  राह बदलने का 
चाहो  तो मेरे साथ चलो 
लो हाथ ,हाथ में साथ चलो 
बन साथी डग में साथ रहो 
नारीत्व के पर्दे के पीछे 
मेरे व्यक्ति को ललकारने का 
मैने  न  तुम्हे अधिकार दिया .......



बुधवार, 31 अक्टूबर 2012

कविता
 
मैं बहुत देर तक शब्दों को
पकडती रही,
कविता रचने का प्रयास करती रही
और शब्द उड़ते रहे
आगे -पीछे
दाएँ -बाएं
बनते-बिगडते रहे 
कभी बादल बन
विस्तृत आकाश की सीमा 
लांघने की कोशिश में विफल
कभी चाँद की चांदनी 
में पिघल गए 
तो कभी सूरज की गर्मी 
में जल गए। 
मैं बहुत देर तक दिल और 
दिमाग को मिलने का 
प्रयास करती रही
कविता रचने का प्रयास करती रही .
शब्दों की धार 
कभी तीखी होकर 
अपनों को घायल कर देती   
तो कभी पनीली हो
दिशा बदल देती
मैं उन्हे कागजों में समेटने का
प्रयास करती रही।
मैं बहुत देर तक शब्दों को
पकडती रही, 
कविता रचने का प्रयास करती रही ........... 

बुधवार, 10 अक्टूबर 2012

हाथ
हर बेटी मानती है कि उसके पिताजी इस दुनिया  का सबसे अच्छे पिता  हैं ,उन जैसा कोई दूसरा हो ही नहींसकता .मुझे भी यही विश्वास  है .मेरे बाबूजी जैसा कोई नहीं सारे संसारमें .कोई समस्या हो ,कोई प्रश्न हो 
सबका हल बाबूजी के पास ....आज मैं  जहाँ हूँ जैसी भी हूँ बाबूजी की वजह से ...मैं इस  ऋण से  कभी भी उऋण नहीं हो पाऊँगी .यदि कई जन्म होते है तो हर जीवन में आपको ही पिता रूप में पाऊ .... 
 मैने कल रात  
एक सपना देखा
सपने में बाबूजी थे,माँ थीं
सभी थे,परिवार था
और सबसे साफ़ थे
बाबूजी के हाथ।
उनकी सख्त उंगलियो 
के बीच
मेरी  नरम हथेली
एक सुदृढ़  आश्रय।
संयत,कोमल पर दृढ़ .
उनको पकड़ते ही 
बिना हिले-डुले
मेरे पाँव उठ जाते
मंजिल के  पार,
आत्मविश्वास के साथ .  
 पीठ पर
उनकी हथेलिओं का अहसास
 कभी सांत्वना से भरा 
कभी उत्साह जगा देता  
तो कभी सर पर
नरमी से पड़
करता  दुलार .
कभी दृढ  ऊँगली  
उठ पड़ती
मनाही की सलाह देती.
हर बार असरदार
उन हाथों के बलबूते
ज़िन्दगी यहाँ पहुँच गयी......
आँख खुली तो याद आया
कल ही तो
बैंक मैनेजर  ने बताया
आपके बाबूजी के हाथ
अब लिख नहीं पाते
बहुत है हिल जाते
अब कलम नहीं पकड़ पाते 
कमज़ोर हो गए है 
इसलिए अंगूठे से 
चलाना पड़ेगा काम  
गडमड से हुए  चित्र
असहाय सी  काया.
कैसी है ईश्वर की माया।
बाबूजी के हाथ  
अपनी हथेलिओं में थाम 
मन ही मन किया वादा 
एक इरादा ......
और फिर चल पड़ी उस राह पर 
जिस राह को दिखाते रहे 
बाबूजी के हाथ . 

रविवार, 30 सितंबर 2012


आज सुबह-सुबह एक कार्यक्रम देख रही थी.इमरान साक्षत्कार कर रहे थे जाने माने कलाकार विक्टर बनर्जी का..इसी दौरान उन्होंने  एक बहुत ही हृदयस्पर्शी कहानी सुनाई जो इस प्रकार है .....
   'उत्तराखंड  बचाओ आन्दोलन' के समय की बात है.विक्टर उस समय मसूरी में रह रहे थे और आन्दोलन में संलग्न थे, वे बताते हैं  कि  वे  उत्तराखंड के लोगों  के परिश्रमी और निर्मल व्यवहार से बहुत प्रभावित हैं  .उनका मानना है कि  वहां के लोगों  को ईश्वर  का आशीर्वाद है . एक दिन उनका दूधवाला उदय उनके पास आया और बोला साहब मैं  आपको ५ रूपये किलो दूध देता हूँ। रस्किन बोंड साहब को छह में देता हूँ और बाज़ार में सात रूपये में बेचता हूँ.आप मुझे ज्यादा नहीं दे  सकते तो कम से कम रस्किन साहब के बराबर तो दीजिये.विक्टर बहुत शर्मिंदा हुए और बोले मैं  भी यही सोच रहा था और यदि ऐसा है तो मैं  तुम्हारे साथ बहुत अन्याय कर रहा हूँ ..दरअसल मैं ४ साल से खाली बैठा हूँ . कुछ कमा नहीं रहा हूँ इसलिए अभी ६  तो नहीं दे सकता ...उनकी बात पूरी भी न हो पाई कि  उदय ने अपनी बीड़ी  का तेज़ कश लेते हुए कहा,
"ठीक है , साढ़े  चार दे देना...और निर्विकार भाव से चल दिया.  अनपढ़  मात्र दूधवाला और इतना विशाल ह्रदय .......मुझे गर्व है अपने लोगों  पर ....

गुरुवार, 20 सितंबर 2012

           रोज़ ६.१५ का समय तय है .हम तीनों  नियमानुसार  निकल पडे.तय स्थान है जहाँ शाम को हम walk के लिए जाते है .walk के साथ talk  भी उसी speed से होता है पतियों की बुराई से लेकर बच्चों की पढाई और बाइयों का रोना .......दिन भर की हलचल......सबको साझा करने का वही समय है (ये अलग बात है कि पतले होने की बजाय हमारा वज़न बढ़ता जा रहा है ).
        कल की ही बात है निश्चित  समय पर हम निकल गए .अभी पहला चक्कर लगाते हुए ही हमने अपनी तारीफ की थी किहम अभी भी कितनी स्वस्थ है  हमारे कान आंख और हाथ पैर सब सही सलामत है वरना तो इस उम्र तक आते आते आजकल की महिलाएं रोगों को गले लगा लेती है (गोकि हम बहुत बुज़ुर्ग हों ) 
      थोडा झुटपुट हुआ ही था,बारिश के दिनों में यूँ भी अँधेरा जल्दी हो जाता है गणपति की चहलपहल थी .हम अपनी गप्पों में व्यस्त .... अंतिम चक्कर (कुछ इमारतों के चारों ओर बनी कच्ची  पक्की सड़क पर ही लोग walk   करते है)तभी पीछे से एक हाथ आया और मेरे साथ चल रही महिला के गले में पहनी  सोने की चैन खिंच ली जब तक समझ आता मैं  जोर  से चिल्लाई बाकी दोनों भी चिल्लाने लगी .वह व्यक्ति घबरा गया मैं व्  मेरी दूसरी सहेली उसके पीछे  भागी  घबराहट कि वज़ह से  चेन उसके हाथ से छुट गयी  काफी दूर तक हमने उसका पीछा किया पर वो भाग गया .
         जब ये घटना घटी उस समय जिस ओर वो भगा उस सड़क पर दो नौजवान थे....... थोड़ी दूरी पर दो watchman  बात कर रहे थे .......बिल्डिंग के पास एक महिला अपने  बच्चे को घुमा  रही थी .....सामने से दो अधेड़  उम्र पुरुष आ रहे थे ......सबने हमे सलाह दी कि सोना पहनकर मत निकला करो .......     

बुधवार, 12 सितंबर 2012

उम्र ..........

आओ समय मैं सहेज लूँ
बंद कर अपनी हथेली
ताउम्र न खुले ये पहेली .....
जान भी न पाए कोई
क्यों हुए  थे गाल  गुलाबी .
क्यों नशे में बंद आंखे
क्यों छाई  थी वो लाली।
याद कर कर के वो शर्माना .
बस  धीरे  से मुस्काना
कही खो जाना ,गुम  हो जाना
रातों को जागते रहना
उजाले में भी घबराना
कभी  बाते  न  करना 
कभी उड़ाने आसमानों की
कभी  महफिले सजती ,कभी  
न कोई साथी न सहेली
कोई कहता लड़कपन
कोई समझे मनमौजी
नाज़ुक सी उम्र के वो सपने
सुहाने मोड़ जीवन के
उम्र सोलह की वो अलबेली
आओ समय मैं सहेज लूँ
बंद कर अपनी हथेली
ताउम्र न  खुले ये पहेली।।।।।।।


मंगलवार, 11 सितंबर 2012

           फिर बेटी ने कहा
माँ मुझको भी आने दो, अपनी गोद सजाने दो 
बनकर आसमान में चंदा ,चांदनी से भर दूंगी 
बनकर असमान का सूरज ,मैं रौशनी कर दूंगी 
बनकर फूलों की पंखुडिया, अपनी गोद सजाने दो 
आने दो माँ ,आने दो माँ ,अपनी गोद सजाने दो
तितली बनकर आसपास ,जब मैं  लहराऊंगी
लाल लाल होठों से माँ - माँ कर गाऊँगी
रातों को न जगाउगी माँ ,तुमको न कभी सताउंगी
एक बार आने दो माँ, अपनी गोद सजाने दो 
मैं परछाई हूँ तुम्हारी,  कैसे खुद से दूर करोगी 
क्या लोगों के तानो से तुम ,अब भी डरोगी
मुझको मारकर -मरवाकर क्या तुम जी सकोगी 
मुझ को देकर जन्म माँ ,जीवन का गीत गाने दो .
एक बार आने दो माँ अपनी गोद सजाने दो