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शनिवार, 7 मार्च 2020

हम कितनी सहजता से अपने बच्चों में जातीयता पिरो देते हैं।

 कल story telling session में गई थी। एक महिला महाभारत की कहानी सुना रही थीं। लगभग पांच से आठ वर्ष के बच्चे थे। महिला हर पात्र के नाम के साथ जाति अवश्य बता रहीं थीं जैसे परशुराम ब्राह्मण थे, युधिष्ठिर क्षत्रिय,कर्ण के पालक शूद्र थे। और बच्चे भी पूछने पर जाति सहित पात्र का नाम लेकर उत्तर दे रहे थे।किसी भी बच्चे को देखकर नहीं लग रहा था कि वे इस जातीय भेदों से अनभिज्ञ है। किसी भी बच्चे के भीतर इन जातियों को लेकर कोई जिज्ञासा नहीं थी। कि ब्राह्मण क्या और क्यों होता है? शूद्र कौन और क्यों हुआ?

मुझे याद है हमारे स्कूल की इतिहास की किताब में भी पहला या दूसरा चैप्टर होता था जहाँ वर्ण व्यवस्था की जानकारी दी जाती थी। हालांकि उस जानकारी का उद्देश्य वह नहीं है जो हमने मान लिया है।

दादी के समय में इस भेद को हमने महसूस किया था पर वो भी इतना नहीं था कि अपनी जड़ें दिमाग में जमा पाए।सामान्यतः घर में इन बातों को तवज्जो नहीं दी जाती थी।

बारहवीं तक जिस स्कूल में पढ़ी वहाँ के संस्थापक प्रताप भैय्या की सख्त हिदायत के चलते कभी सहपाठियों की जाति पता नहीं चली। हम सिर्फ़ नाम लिखते थे।

डाक्टर यशोधर मठपाल के साथ काम किया तो उन्होंने नाम के पीछे भारती लगा दिया।शादी के समय पता चला कि कुमाऊँ में भी तीन तरह के ब्राह्मण होते हैं।जिनका बंटवारा धोतियो से होता है। पर कुमाऊँ से बाहर आ जाने के बाद धोतियों वाली बात बेअसर हो गई।

अब जब बेटी विदेश गई तो  उसके सहकर्मियों ने उससे पूछा गया कि वो किस धर्म की अनुयायी हो , उसने बताया कि वो किसी धर्म को फौलो नहीं करती तो गर्व से सीना फूल गया।

क्यों न आने वाले वर्ष में धर्म और जातियता को गौण कर मानवता को प्रमुखता देते हुए एक नई शुरूआत करें! धर्म - जाति मुक्त समाज की नींव डालें। आइए पहले मानसिक विकास करें।

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