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शनिवार, 7 मार्च 2020

अनदा

कुल जमा तीन रोडवेज़ की बस चलती थी वहाँ।

 एक हल्द्वानी से सुबह आठ बजे चलकर ढाई बजे पहुंचती। दूसरी नैनीताल से दोपहर दो बजे चलकर शाम साढ़े पांच बजे पहुंचती। तीसरी दोपहर ढाई बजे हल्द्वानी से चलकर शाम साढ़े सात बजे मुक्तेश्वर पहुंचती।

मुक्तेश्वर तक पहुचने के लिए तीन स्टेशन पड़ते। भवाली, जिसे बड़ा स्टेशन माना जाता क्योंकि यह ऐसा जंक्शन था वहाँ से एक रोड अल्मोड़ा, रानीखेत तथा पिथोरागढ आदि पहाडों को जाती और दूसरी मुक्तेश्वर , भीमताल, घोड़ाखाल की ओर।

दूसरा स्टेशन आता रामगढ़। प्रकृति ने इतनी सुंदरता से नवाजा था इसे।सेब, खुबानी, आड़ू से लकदक पेड़ों का गाँव रामगढ़। यहाँ की प्राकृतिक सौंदर्य से मोहित हो महादेवी वर्मा ने यहाँ एक घर बनाया और साहितयिक रचनाएँ कीं। रविंद्र नाथ टैगोर यहाँ के सौंदर्य से इतने प्रभावित थे कि यहाँ शांतिनिकेतन बनाना चाहते थे।

अमूमन रामगढ़ में गाड़ी के रूकने का समय पंद्रह मिनट था। पकौड़ी चाय, आलू गुटके रायता का नाश्ता इन पंद्रह मिनटों में निबट जाता। कोई नया ड्राइवर होता तो दस मिनट में ही गाड़ी स्टार्ट हो जाती पर अगर अन दा यानी आनंदसिंह और लल दा यानी लालसिंह होते तो गाड़ी आधे घंटे से ज्यादा भी रूक सकती थी।  उसका विशेष कारण था। सड़क के उस पार थोड़ा नीचे की ओर देशी शराब की दुकान थी। शाम की बस के ड्राइवर अक्सर एकाध पाउच सुरासेवन के बाद ही वहाँ से प्रस्थान करते। मैं नहीं जानती कि क्या चमत्कार था पर खतरनाक घुमावदार रास्तों में गाड़ी सही समय में मुक्तेश्वर पहुंच जाती। लालसिंह जी और आनंदसिंह की बस से मैंने लगभग आठ या दस साल सफर किया होगा, जब वे पीकर टाइट हुए थे। हर बार अलग अलग कुछ मीठे,नमकीन और मिर्चिले अनुभव हुए।

वो हमारी मजबूरी भी थी और विश्वास भी कि हमें उन बसों में यात्रा करनी पड़ती थी। । मजबूरी ये कि आने जाने का कोई दूसरा साधन न था। हमारे तब के वैज्ञानिक पिताजी भी कार एफोर्ड नहीं कर पाते थे या जरूरत भी नहीं समझते थे। हाँ विश्वास गजब का।सब कुछ जानते हुए भी पिताजी कह जाते," यार अनदा, बच्चे आ रहे हैं।ख्याल रखना। " और अनदा भी तिरछी मुशकुराहट के साथ सलाम ठोककर चिंता न करने का आश्वासन देते । 😍कभी हमें ये चिंता नहीं हुई कि घर कब पहुंचेंगे।न जाने कितनी बार शाम की दोनों बसों में यात्रा कीं।

जाड़ों में तो पांच बजे घुप्प अंधेरा हो जाता था पर मजाल कि इतने मदिरापान के बाद भी ये ड्राइवर का स्टैरिंग लड़खड़ाए।

एक बार की बात है एक बंगाली अधेड़ परिवार नैनीताल से बस में चढ़ा। उस दिन अनदा गाड़ी चला रहे थे। भवाली आतेज्आते बस में उनको मिलाकर पंद्रह यात्री थे।

 रामगढ़ पहुँचते ही अन् दा अपने अड्डे में चले गए। आज थोड़ी ज्यादा ही चढ़ गयी थी शायद। गाड़ी चली। अनदा हमेशा की तरह सुर में बोलते जा रहे थे। बंगाली सज्जन को आभास हो गया था कि अनदा टिल्ल  हैं। डरके मारे वे चिल्लाने लगे और गाड़ी रोकने को कहा। अनदा को गुस्सा आया और वे गाड़ी को बीच रोड में खड़ा कर आगे न चलने के लिए अकड़ गए।

जाड़ों के दिन, अंधेरा, दूर दूर तक बत्ती नहीं दिखती। यात्री उन्हें मनाने लगे पर अनदा मानने को तैयार नहीं। डेढ़ घंटा इसी मानमनौव्वल में गुजर गया।अततः अनदा मान गए और भगवान का नाम लेकर सब बस में चढ़ गए। सबसे ज्यादा हैरान परेशान बंगाली दंपत्ति थे।

 बस तेजी से सर्पीली चढ़ाई में चढ़ा रहे अनदा हमारे हीरो थे। आज तो उनका उत्साह देखते ही बनता। जैसे ही बंगाली पत्नी के मुंह से डरी डरी सी चीख निकलती अनदा जोरदार ब्रेक लगाते। रोडवेज़ की खटारा बस चीत्कार कर धीमी हो जाती। अनदा नजर तिरछी कर लगभग इस अंदाज़ में देखते कि रोक दूं फिर से। बंगाली पति पत्नी को जोरों से घुड़की देते। अनदा विजयी भाव से तिरछी हंसी हंस कर गाड़ी की गति बढ़ा देते।

भटेलिया में तब गेट व्यवस्था थी।पहाडों से आने और जाने वाली गाड़ियों के लिए नियत समय पर गेट खुलता। शाम को पांच बजे और फिर सात बजे। पांच बजे का समय निकल गया तो सात बजे तक का इंतज़ार करना पड़ता।

भटेलिया अमूमनतया सुनसान रहता। गिनी चुनी दुकानों में से किसी एक में मरियल सा पीला बल्ब होता या काली पढ़ चुके कांच वाली ढिबरी मनहूसियत सी फैलाती। एकाध पियक्कड़ अपनी धुनकी में चिल्लाता तो आसपास अलसाया  कुत्ता सिर ऊपर उठाकर वाऊ की आवाज़ के साथ निंद्रामग्न हो जाता।

आज तो पांच बजे का गेट बंद हो गया। अब सात बजे ही बारी आएगी। बचे खुचे यात्री चाय पीने निकल गए। बस में हम तीन लोग थे। बंगाली दंपत्ति और मैं। पत्नी का बहुत देर से रूका रोना फूट पड़ा। डरे हुए पति ने उसे बाहों में ले दिलासा दिलाया। हिचकियाँ लेती स्त्री मेरी ओर देखकर बोलीं। तुम्हें इस बस में नहीं आना चाहिए था। उन्हें चिंता ये थी कि वो लोग नहीं होते तो मेरा क्या होता। और मैं इससे बेखबर उनकी घबराहट का मजा ले रही थी।

मैं कभी अनदा की गाड़ी में दुर्घटना या किसी और प्रकार की अवांछनीय घटना की कल्पना कर ही नहीं सकती थी। मैं क्या, मुक्तेश्वर में रहने वाला कोई भी पिये हुए अनदा और बिन पिए अनदा पर पूरा भरोसा करता था। गाड़ी को पहुंचने में बेशक दो तीन घंटे की देरी हो सकती है पर उअनदा की गाड़ी की दुर्घटना की खबर इतने सालों में नहीं मिली।

भटेलिया से आधा घंटे का रास्ता है मुक्तेश्वर का। पहुँच ही गए जैसा आभास होता था। ये घटना एक दिन की नहीं। बचपन से बड़े होने तक अनदा की बस में ऐसी न जाने कितनी रौमांचक यात्राएं की हैं हमने।

मुक्तेश्वर छोड़ने के बाद भी के ई दिनों तक हल्द्वानी के बस अड्डे में जाकर बसक्षके पास पहुंचकर मुक्तेश्वर की खुशबू लेती थी मैं।मिलने पर अनदा मूंछों के भीतर तिरछी मुसकुराहट के साथ हाथ उठाकर सब ठीक होने का इशारा कर अपनी ड्राइवर वाली गद्दी में शान से बैठ जाते मानो जिल्लेइलाही अकबर अपने तख्तोताज पर आसीन हों।

फोटो साभार गूगल।

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