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गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

तुम कविता बन जाओ..........


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छंदो  पद्यों की लहरी ,
स्वर शब्दों की साधना ,
सरिता सी कल -कल करो ,
      और तुम कविता बन जाओ। 

गीत कोई भूला -बिसरा ,
राग कोई विस्मृत सा हो ,
सोई आँखों का सपना बन ,
मलय पवन  सी बहो ,
      और तुम कविता बन जाओ। 

छोटी बूंदों की लड़ियाँ बन ,
घन घमंड को चूर करो ,
आसमान  को उद्वेलित कर,
वर्षा की रिमझिम बन जाओ ,
        और तुम कविता बन जाओ। 

पर्वत के आँचल की हरियाली,
सागर में क्रीड़ा करने वाली ,
मत्स्यावली  सी तैर- तैर ,
आलोड़ित ह्रदय को करो ,
        और तुम कविता बन जाओ। 

मेरे आँगन की बगिया को ,
भाँति भाँति के सुमनों की ,
सुगन्धोरस की गरिमा से ,
चहुँ ओर प्रसारित करो ,
       और तुम कविता बन जाओ। 

जीवन की अंतिम बेला हो जब ,
कोई विस्मृत ऐसी घटना ,
जो हास्य अधर की बन जाये ,
तुम  ऐसी बात सुना जाओ ,
        और तुम कविता बन जाओ। 




3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (25-04-2015) को "आदमी को हवस ही खाने लगी" (चर्चा अंक-1956) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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