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बुधवार, 4 जुलाई 2012



बस यूँ ही आँख बंद किये 
आँगन में बैठी
धूप पी रही थी
कि एक नन्ही सी तितली
काली पीली धब्बो वाली
बांह पर  आकार बैठ गयी
और बार बार 
पंख फडफडा कर 
अपना अस्तित्व जताने की
कोशिश करती रही .
हवा का झोंका,
मेरी सांसो की गति, 
उसे उड़ा न सकी 
मैं उनींदी आँखों से 
देखती रही उसे
 निहारती रही 
मैं हिलाना नहीं चाहती थी उसे 
उड़ाना भी नहीं चाहा 
न उसे पकड़ना चाहा
 न उसे डराना चाहती थी 
बस महसूस करती रही 
प्रकृति के उस 
अदभुत सौंदर्य को........... 

11 टिप्‍पणियां:

  1. प्रकृति तो अद्भुत सौंदर्य से भरी पडी है

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  2. आखिर में यह अहसास ही रह जाता है, जो काम आता है।

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  3. प्रकृति की इन अनुपम रचनाओं को महसूस करने की बात कर आपने पर्यावरण के प्रति अपनी संवेदना का इज़हार बड़े सरल शब्दों में किया है।

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  4. अच्छे भाव हैं...बधाई..
    ---हाँ ,व्याकरणीय त्रुटि है...बांह में आकार बैठ गयी =बांह पर आकर .. होना चाहिए ..

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    1. ब्लॉग में आने के लिए धन्यवाद्

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