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रविवार, 27 मई 2012








समुंदर की लहर 
बड़ी बेआबरू है जी 
बेलिहाज होकर 
यू ही इतराती 
बलबलाती है, बलखाती 
चली आती है 
न जाने कैसे
किस छोर से 
पागल,
 मिटा कर चली जाती है 
समुंदर की लहर देखो .
कभी गाती कभी डराती
कभी बुलाती अपनी ओर 
कभी उथली कभी धुंधली 
नागिन सी ये
 बलखाती चली आती है 
समुंदर की लहर देखो .
कभी सिमटी कभी बिखरी
 कभी नखरे दिखाती 
 पावों में लिपट जाती 
अधूरी  सी  कभी  पूरी 
समुंदर की लहर देखो. 
कोशिश मैने भी बहुत की
रेत में नाम लिखने की 
 मिटा कर  चली गयी
नाम की गहराई  पर
समुंदर की लहर  देखो
कई घरोदे  भी बने होंगे
कई सपने सजे होंगे 
पर इसे क्या फिकर 
ये नहीं किसकी 
समुंदर की लहर देखो..............
 


14 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही बढ़िया शब्द संयोजन उम्दा पोस्ट....

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  2. फिर भी यह कहूँगी कि पसंद अपनी-अपनी ख्याल अपना-अपना क्यूंकी मुझे बहुत अपनी सी लगती है यह समादर कि लहरें ....

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. समुंदर की लहरों के संग कुछ उपमाएं नहीं जमती। जैसे नागिन सी बलखाती...

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    1. जी ,आगे ध्यान रखूंगी बस जैसा महसूस किया वो लिख दिया ,सुझाव के लिए आभार

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  5. बहुत ही सुंदर भाव...सुन्दर प्रस्तुति...हार्दिक बधाई...

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  6. बहुत ही सुन्दर भाव संजोयन है..
    सुन्दर रचना....

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  7. समुंदर की लहर में जीवन की तरंग है।

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