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शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011


आगे कदम बढाते चलो,
 रुको न तुम कभी .
अटको न राह में,
 चूको  न कभी.
 पहाड़ कितना बड़ा हो सामने,
 नाप लो उचाईयों  की डगर.
 सागर को गहरा जितना,
 निकाल लो मोती इस पहर .
रखो बस  ध्यान इतना,
 न डगमगाएं  कदम .
जहा भी  चाह हो,
 निकल आये राह वही.
न गुम हो डगर नज़र से कभी,
 बढे अब तो हर कदम वहा ,
जहा राह हो फूलो से भरी.
 कांटे न आने पाए राहों में,
न छाए अँधेरा आँखों में कभी, 
न गुम हो रौशनी ,
  बढाते जाओ कदम .
 रखो बस ध्यान इतना,
 न डगमगाए कदम.


3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों....बेहतरीन भाव....खूबसूरत कविता...

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  2. कृपया वर्ड वेरिफिकेशन हटा लें ...टिप्पणीकर्ता को सरलता होगी ...
    वर्ड वेरिफिकेशन हटाने के लिए
    डैशबोर्ड > सेटिंग्स > कमेंट्स > वर्ड वेरिफिकेशन को नो NO करें ..सेव करें ..बस हो गया .

    उत्तर देंहटाएं